आज भाई को फुरसत है
आज भाई को फुर्सत है
Part 1 🖊️
एक भगत सत्संग में जाने लगा। दीक्षा ले ली, ज्ञान सुना और भक्ति करने लगा।अपने मित्र से भी सत्संग में चलने तथा भक्ति करने के लिए प्रार्थना। परंतु दोस्त नहीं माना। कह देता कि कार्य से फुर्सत नहीं है। छोटे-छोटे बच्चे हैं। इनका पालन पोषण भी करना है। काम छोड़कर सत्संग में जाने लगा तो सारा धंधा चौपट हो जाएगा।
वह सत्संग में जाने वाला भगत जब भी सत्संग में चलने के लिए अपने मित्र को कहता तो यही कहता कि अभी काम से फुर्सत नहीं है। 1 वर्ष पश्चात उस मित्र की मृत्यु हो गई।उसकी अर्थी उठाकर कुल के लोग तथा नगर वासी चले ,साथ साथ सैकड़ों नगर- मोहल्ले के व्यक्ति भी साथ-साथ चलें। सब बोल रहे थे कि राम नाम सत्य है, सत्य बोले गत हैं।
भगत कह रहा था कि राम नाम तो सत्य है परंतु आज भाई को फुर्सत है। नगर वासी कह रहे थे कि सत्य बोले गत हैं, भगत कह रहा था कि आज बाई को फुर्सत हैं। अन्य व्यक्ति उस भगत से कहने लगे कि ऐसे मत बोल, इसके घर वाले बुरा मानेंगे। भगत ने कहा कि मैं तो ऐसे ही बोलूंगा।मैंने इस मूर्ख से हाथ जोड़कर प्रार्थना की थी कि सत्संग में चल, कुछ भक्ति कर ले। यह कहता था कि अभी फुर्सत अर्थात खाली समय नहीं है। आज इसको परमानेंट फुर्सत है।छोटे बच्चे भी छोड़ चला जिनके पालन-पोषण तक का बहाना करके परमात्मा से दूर रहा। भक्ति करता तो खाली हाथ नहीं जाता। कुछ भक्ति धन लेकर जाता। बच्चों का पालन पोषण तो परमात्मा करता है। भक्ति करने से साधक की आयु भी परमात्मा बढ़ा देता है। भगत जन ऐसा विचार करके भक्ति करते हैं, कार्य त्यागकर सत्संग सुनने जाते हैं।
भगत विचार करते हैं कि परमात्मा ना करें हमारी मृत्यु हो जाए। फिर हमारे कार्य कौन करेगा?
हम यह मान लेते हैं कि हमारी मृत्यु हो गई। हम 3 दिन के लिए मर गए, यह विचार करके सत्संग में चले, अपने को मृत्यु मान ले और सत्संग में चले जाए। वैसे तो परमात्मा के भक्तों के कार्य बिगड़ता नहीं है फिर भी हम मान लेते हैं कि हमारी गैर हाजरी में कुछ कार्य खराब हो गया तो 3 दिन के बाद जाकर ठीक कर लेंगे। यदि वास्तव में टिकट कट गया अर्थात् मृत्यु हो गई तो परमानेंट कार्य बिगड़ गया। फिर कभी ठीक करने नहीं आ सकते। इस स्थिति को जीवित मरना कहते है।
Part 2 🖊️
हमारी जन्म और मृत्यु क्यों होती है आखिर यहां पर हमारा जन्म होता है फिर हमारे को क्यों मार दिया जाता आखिर इसके पीछे किस प्रभु का स्वार्थ है ?
इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए कृपया आप जीने की राह अवश्य पढ़ें।
एक दिन मैंने साधना चैनल पर सत्संग सुना 7:30 pm पर सत्संग के अंदर बताया जा रहा था कि मानव शरीर प्राणी को अपना मूल उद्देश्य याद रखना चाहिए।
संत जी बता रहे थे की मनुष्य का मूल उद्देश्य क्या है उन्होंने बताया सूक्ष्म वेद में लिखा है कि:- (राग आशावरी शब्द नंबर 71)
यह सौदा फिर नाही संतों, यह सौदा फिर नाही।
लोहे जैसा ताव जात हैं , काया देश सराही ।।
तीन लोग और भुवन चतुर्दश, सब जग सौदे आही।
दुगने-तिगने किए चौगुने, किंंहु मुल गवाही।
भावार्थ :-जैसे दो व्यापारी दूर किसी शहर में सौदा करने गए और 5-5 लाख रुपये मूलधन ले गए। एक ने अपने धन का सदुपयोग किया। धर्मशाला या होटल में किराए पर कमरा लिया। सामान खरीदा और महंगे मोल बेचा। जिससे उसने 20 लाख रुपए और कमा लिए। 2 वर्ष में वापस अपने घर आ गया। सब जगह प्रशंसा हुई और धनी बन गया।
दूसरे ने भी होटल या धर्मशाला में कमरा किराए पर लिया। शराब पीने लगा, वेश्याओं के नृत्य देखना, खाता और सो जाता। उसने अपना मोल धन 5 लाख रुपये भी नष्ट कर दिया, वापस घर आया तो कर्जा हो गया। जिससे 5 लाख रुपए उधार लेकर गया था, उससे अपना 5 लाख का धन पुरा किया। उपरोक्त वाणी का यही तात्पर्य है की तीन लोग में जितने भी प्राणी है, वे सब अपना राम-नाम का सौदा करने आए हैं। किसी ने तो दुगुना, तीन गुना, चार गुना धन कमा लिया अर्थात पूर्ण संत से दीक्षा लेकर मनुष्य जीवन के श्वास की पूंजी जो मूलधन है उसको सत्य भक्ति करके बढ़ाया। अन्य व्यक्ति जिसने भक्ति नहीं की, शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण किया या अनअधिकारी गुरु से दीक्षा लेकर भक्ति कि उसको कोई लाभ नहीं मिलता। यह पवित्र गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 मैं प्रमाण है। जिस कारण से उसने भी अपना मनुष्य जीवन के श्वास रूपी मूलधन को सत्य भक्ति बिना नष्ट कर लिया।
अगर आप भी मनुष्य जीवन का सदुपयोग करना चाहते हैं तो कृपया जीने की राह पुस्तक अवश्य पढ़ें। 📥
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www.jagatgururampalji.org
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एक भगत सत्संग में जाने लगा। दीक्षा ले ली, ज्ञान सुना और भक्ति करने लगा।अपने मित्र से भी सत्संग में चलने तथा भक्ति करने के लिए प्रार्थना। परंतु दोस्त नहीं माना। कह देता कि कार्य से फुर्सत नहीं है। छोटे-छोटे बच्चे हैं। इनका पालन पोषण भी करना है। काम छोड़कर सत्संग में जाने लगा तो सारा धंधा चौपट हो जाएगा।
वह सत्संग में जाने वाला भगत जब भी सत्संग में चलने के लिए अपने मित्र को कहता तो यही कहता कि अभी काम से फुर्सत नहीं है। 1 वर्ष पश्चात उस मित्र की मृत्यु हो गई।उसकी अर्थी उठाकर कुल के लोग तथा नगर वासी चले ,साथ साथ सैकड़ों नगर- मोहल्ले के व्यक्ति भी साथ-साथ चलें। सब बोल रहे थे कि राम नाम सत्य है, सत्य बोले गत हैं।
भगत कह रहा था कि राम नाम तो सत्य है परंतु आज भाई को फुर्सत है। नगर वासी कह रहे थे कि सत्य बोले गत हैं, भगत कह रहा था कि आज बाई को फुर्सत हैं। अन्य व्यक्ति उस भगत से कहने लगे कि ऐसे मत बोल, इसके घर वाले बुरा मानेंगे। भगत ने कहा कि मैं तो ऐसे ही बोलूंगा।मैंने इस मूर्ख से हाथ जोड़कर प्रार्थना की थी कि सत्संग में चल, कुछ भक्ति कर ले। यह कहता था कि अभी फुर्सत अर्थात खाली समय नहीं है। आज इसको परमानेंट फुर्सत है।छोटे बच्चे भी छोड़ चला जिनके पालन-पोषण तक का बहाना करके परमात्मा से दूर रहा। भक्ति करता तो खाली हाथ नहीं जाता। कुछ भक्ति धन लेकर जाता। बच्चों का पालन पोषण तो परमात्मा करता है। भक्ति करने से साधक की आयु भी परमात्मा बढ़ा देता है। भगत जन ऐसा विचार करके भक्ति करते हैं, कार्य त्यागकर सत्संग सुनने जाते हैं।
भगत विचार करते हैं कि परमात्मा ना करें हमारी मृत्यु हो जाए। फिर हमारे कार्य कौन करेगा?
हम यह मान लेते हैं कि हमारी मृत्यु हो गई। हम 3 दिन के लिए मर गए, यह विचार करके सत्संग में चले, अपने को मृत्यु मान ले और सत्संग में चले जाए। वैसे तो परमात्मा के भक्तों के कार्य बिगड़ता नहीं है फिर भी हम मान लेते हैं कि हमारी गैर हाजरी में कुछ कार्य खराब हो गया तो 3 दिन के बाद जाकर ठीक कर लेंगे। यदि वास्तव में टिकट कट गया अर्थात् मृत्यु हो गई तो परमानेंट कार्य बिगड़ गया। फिर कभी ठीक करने नहीं आ सकते। इस स्थिति को जीवित मरना कहते है।
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एक दिन मैंने साधना चैनल पर सत्संग सुना 7:30 pm पर सत्संग के अंदर बताया जा रहा था कि मानव शरीर प्राणी को अपना मूल उद्देश्य याद रखना चाहिए।
संत जी बता रहे थे की मनुष्य का मूल उद्देश्य क्या है उन्होंने बताया सूक्ष्म वेद में लिखा है कि:- (राग आशावरी शब्द नंबर 71)
यह सौदा फिर नाही संतों, यह सौदा फिर नाही।
लोहे जैसा ताव जात हैं , काया देश सराही ।।
तीन लोग और भुवन चतुर्दश, सब जग सौदे आही।
दुगने-तिगने किए चौगुने, किंंहु मुल गवाही।
भावार्थ :-जैसे दो व्यापारी दूर किसी शहर में सौदा करने गए और 5-5 लाख रुपये मूलधन ले गए। एक ने अपने धन का सदुपयोग किया। धर्मशाला या होटल में किराए पर कमरा लिया। सामान खरीदा और महंगे मोल बेचा। जिससे उसने 20 लाख रुपए और कमा लिए। 2 वर्ष में वापस अपने घर आ गया। सब जगह प्रशंसा हुई और धनी बन गया।
दूसरे ने भी होटल या धर्मशाला में कमरा किराए पर लिया। शराब पीने लगा, वेश्याओं के नृत्य देखना, खाता और सो जाता। उसने अपना मोल धन 5 लाख रुपये भी नष्ट कर दिया, वापस घर आया तो कर्जा हो गया। जिससे 5 लाख रुपए उधार लेकर गया था, उससे अपना 5 लाख का धन पुरा किया। उपरोक्त वाणी का यही तात्पर्य है की तीन लोग में जितने भी प्राणी है, वे सब अपना राम-नाम का सौदा करने आए हैं। किसी ने तो दुगुना, तीन गुना, चार गुना धन कमा लिया अर्थात पूर्ण संत से दीक्षा लेकर मनुष्य जीवन के श्वास की पूंजी जो मूलधन है उसको सत्य भक्ति करके बढ़ाया। अन्य व्यक्ति जिसने भक्ति नहीं की, शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण किया या अनअधिकारी गुरु से दीक्षा लेकर भक्ति कि उसको कोई लाभ नहीं मिलता। यह पवित्र गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 मैं प्रमाण है। जिस कारण से उसने भी अपना मनुष्य जीवन के श्वास रूपी मूलधन को सत्य भक्ति बिना नष्ट कर लिया।
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मनुष्य जनम का मूल उद्देश्य भक्ति करना है, अब भक्ति किसकी करनी चाहिए और मोक्ष प्राप्ति की विधि क्या है?
ReplyDeleteऐसे ही गुढ रहस्य जानने के लिए अवश्य पढे अनमोल पुस्तक #जीने_की_राह इस अनमोल पुस्तक को अभी निशुल्क ओर्डर करने के लिए अभी अपना नाम पूरा पता और मोबाइल नम्बर कमेंट करे...